मेरे प्यारे किसान भाइयों, अरहर (Pigeon Pea) हमारे देश की एक मुख्य दलहनी फसल है। यह न केवल किसानों को बेहतरीन मुनाफा देती है, बल्कि अपनी गहरी जड़ों के कारण भूमि की कठोर परत को तोड़कर उसकी संरचना और उवर्रता (Soil Fertility) को भी बढ़ाती है। अरहर में प्रचुर मात्रा में प्रोटीन (लाइसिन, टाइरोसीन, सिस्टीन, आर्जिनीन अमीनो अम्ल) के साथ-साथ आयरन और आयोडीन भी पाया जाता है।
1. उपयुक्त भूमि और खेत की तैयारी
मिट्टी का चयन: अरहर की खेती बलुअर से लेकर दोमट भूमियों में आसानी से की जा सकती है। कंकरीली और पथरीली भूमियों में भी इसे उगाया जा सकता है, बशर्ते खेत में जल निकास (Water Drainage) की उचित व्यवस्था हो। ध्यान रहे, लवणणीय तथा क्षारीय भूमियां इसके लिए उपयुक्त नहीं होती हैं और मिट्टी का पी.एच. (pH) उदासीन होना चाहिए।
खेत की तैयारी: सबसे पहले 1-2 जुताई मिट्टी पलटने वाले हैरो से करें। इसके बाद 2-3 जुताई कल्टीवेटर या देशी हल से करें या सीधे एक जुताई रोटावेटर से कर लें। अंत में पाटा चलाकर खेत को समतल烟और भुरभुरा तैयार कर लें। बुवाई के समय खेत में उचित नमी होना अनिवार्य है।
भूमि जनित रोगों से सुरक्षा के लिए प्रति एकड़ खेत में:
फॉस्फेक्टिक Culture (2.5 किग्रा) + राइजोबियम कल्चर (2.5 किग्रा) + ट्राइकोडर्मा पाउडर (2 से 5 किग्रा) को 100 से 120 किग्रा सड़ी हुई गोबर की खाद में मिलाकर 4-5 दिनों के लिए छांव में रख दें और आखिरी जुताई के समय खेत में अच्छी तरह मिला दें।
2. प्रमुख प्रजातियाँ, समय और बीज दर
अरहर की बुवाई के लिए हमेशा शुद्ध एवं प्रमाणित बीजों का ही चयन करें। प्रमुख प्रजातियों का विवरण नीचे तालिका में दिया गया है:
| क्र.सं. | किस्म / प्रजाति का नाम | बुवाई का सही समय | बीज की दर (किग्रा/हे.) | बुवाई की दूरी (सेमी) |
|---|---|---|---|---|
| 1 | टाइप 21 (शुद्ध फसल हेतु) | जून का प्रथम पक्ष | 12 – 15 | 60 × 20 |
| 2 | टाइप 21 (मिश्रित फसल हेतु) | अप्रैल का प्रथम पक्ष | 12 – 15 | 75 × 20 |
| 3 | यू पी ए एस 120 (शुद्ध फसल) | मध्य जून | 15 | 50 × 20 |
| 4 | आई सी पी एल 151 | मध्य जून | 20 – 25 | 45 × 20 |
| 5 | नरेन्द्र 1, टाइप 7, अमर, टाइप 17, बहार, आजाद, मालवीय | जुलाई का प्रथम सप्ताह | 10 – 25 (प्रजाति अनुसार) | 60×20 से 120×30 तक |
बुवाई का समय और दूरी: सामान्य तौर पर 15 जून से 15 जुलाई का समय सर्वोत्तम माना जाता है। मानसून के शुरू होते ही बुवाई कर देनी चाहिए। लाइन से लाइन की दूरी 60-90 सेमी और पौधे से पौधे की दूरी 25-30 सेमी रखनी चाहिए।
3. वैज्ञानिक विधि से बीज शोधन (F → I → R क्रम)
जोरदार जमाव और रोगों से रक्षा के लिए बीजों को हमेशा F → I → R क्रम में शोधित करना चाहिए:
- F (Fungicide – फफूँदनाशी): सबसे पहले बीज को 2.5 ग्राम थिरम या 2.5 ग्राम कार्बेन्डाजिम या 5 ग्राम ट्राइकोडर्मा प्रति किग्रा बीज की दर से उपचारित करें।
- I (Insecticide – कीटनाशी): दीमक या चींटी से बचाव के लिए बीज को 3 मिलीग्राम प्रति किग्रा क्लोरपायरीफॉस दवा से उपचारित करें।
- R (Rhizobium – राइजोबियम कल्चर): अंत में प्रति 10 किग्रा बीज की दर से एक पैकेट राइजोबियम कल्चर को उबले हुए ठंडे गुड़ के पानी के साथ घोल बनाकर बीजों पर पतली परत के रूप में लगाकर छांव में सुखा लें।
4. बुवाई की सर्वोत्तम विधि
- छिटकवां विधि की तुलना में कतारों (Lines) में बुवाई करना अधिक लाभकारी है।
- बुवाई सीड ड्रिल या हल के पीछे 4-6 सेमी की गहराई पर करनी चाहिए।
- मेड़ों (Ridges) पर बुवाई अरहर की सर्वोत्तम विधि है। इससे अधिकतम उत्पादन मिलता है और पदगलन, जड़/तना गलन तथा उकठा जैसे रोगों से सुरक्षा होती है।
5. खाद, उर्वरक एवं सिंचाई प्रबंधन
उर्वरक की मात्रा: अच्छी उपज के लिए प्रति हेक्टेयर 80 से 100 कुन्तल कम्पोस्ट खाद के साथ रासायनिक खादों में 10-15 किग्रा नाइट्रोजन, 40-45 किग्रा फास्फोरस और 20 किग्रा सल्फर की आवश्यकता होती है। फास्फोरस के लिए सिंगल सुपर फास्फेट या डी.ए.पी. का प्रयोग करें। उर्वरकों को सीड ड्रिल की सहायता से बीज से 2-3 सेमी नीचे देना चाहिए। खादों की सुचारू उपलब्धता और सरकारी वितरण प्रणालियों की डिजिटल मॉनिटरिंग के लिए आप हमारे Framework for Fertilizer Sale App की विस्तृत रूपरेखा को समझ सकते हैं।
सिंचाई व्यवस्था: अरहर को कम पानी की आवश्यकता होती है। लेकिन यदि खेत में नमी कम हो, तो फलियां बनने के समय (अक्टूबर माह) एक सिंचाई अवश्य करें। पाले से बचाव के लिए दिसंबर या जनवरी माह में की गई सिंचाई बेहद उपयोगी होती है।
अंतर्वर्ती / मिश्रित फसलें: अतिरिक्त लाभ के लिए अरहर के साथ कतारों के बीच ज्वार, बाजरा, मक्का, कपास, सोयाबीन, मूंगफली, सूर्यमुखी, मूंग या उड़द बोई जा सकती है। यदि आप गन्ने के साथ दलहनी फसलों का प्रबंधन देख रहे हैं, तो जुलाई महीने में गन्ने की खेती के जरूरी कार्य की गाइडलाइन को भी देख सकते हैं जो इस समय के प्रबंधन के लिए काफी सहायक है।
6. खरपतवार नियंत्रण, प्रमुख रोग एवं कीट प्रबंधन
खरपतवार नियंत्रण: बोने के 40-50 दिनों तक खेत को खरपतवार मुक्त रखना आवश्यक है। इसके लिए बोने के 15-20 दिन बाद पहली और 40-45 दिन बाद दूसरी निराई-गुड़ाई करें। रासायनिक नियंत्रण के लिए अंकुरण से पूर्व पेंडीमेथलीन की 3.3 लीटर मात्रा को 800 लीटर पानी में घोलकर फ्लैट फैन नाजिल से छिड़काव करें।
प्रमुख रोग और रोकथाम:
- उकठा रोग (Wilt): इसमें जड़ें सड़कर काली हो जाती हैं और तने पर धारियां बनती हैं। जलभराव वाले क्षेत्रों में यह ज्यादा फैलता है। रोकथाम: उकठा रोधी किस्में बोएं, 4-5 वर्ष का फसल चक्र अपनाएं और बीजोपचार ट्राइकोडर्मा से करें।
- बांझ रोग (Sterility Mosaic): पत्तियां छोटी, हल्की रंग की हो जाती हैं और फूल नहीं आते। यह रोग माइट (कीड़े) से फैलता है। रोकथाम: माइट नाशक रसायन का प्रयोग करें और संक्रमित पौधों को उखाड़कर जला दें।
प्रमुख कीट और नियंत्रण:
- दीमक: जड़ और तने को नष्ट करती है। आखिरी जुताई में एंडोसल्फान 4% धूल या लेन्डेन धूल (25-30 किग्रा/हे.) मिलाएं।
- पत्ती लपेटक एवं फली बेधक कीट: ये पत्तियां लपेटकर सफेद जाला बुनते हैं और फलियों में छेद करके दानों को खाते हैं। इसके नियंत्रण के लिए मोनोक्रोटोफास 36 ई.सी. (800 मिली) या एंडोसल्फान 35 ई.सी. (1.25 से 1.50 लीटर) प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।
7. कटाई, मड़ाई एवं कुल उपज
जब खेत में 75 प्रतिशत फलियां सुनहरे रंग की होकर सूख जाएं, तो फसल काटकर सुखा लेनी चाहिए और मड़ाई (थ्रेसिंग) करके दानों को अलग कर लेना चाहिए। भंडारण से पहले दानों को अच्छी तरह सुखा लें।
- मुख्य दाना (अनाज): 25 से 30 कुन्तल
- भूसा (चारा): 10 से 15 कुन्तल
- लकड़ी (ईंधन): 50 से 60 कुन्तल
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उकठा और जड़ गलन जैसे घातक भूमि जनित रोगों से सुरक्षा के लिए सर्वोत्तम जैविक फफूंदनाशी।
अरहर की जड़ों में गांठों के विकास और नाइट्रोजन स्थिरीकरण को बढ़ाने के लिए उपयोगी कल्चर।
❓ अरहर की उन्नत खेती से जुड़े सामान्य सवाल (FAQs)
उत्तर: अरहर की बुवाई के लिए सामान्यतः 15 जून से 15 जुलाई का समय (मानसून की शुरुआत) सबसे बेहतरीन माना जाता है।
उत्तर: इसका मतलब है कि बीजों को सबसे पहले फफूंदनाशी (Fungicide), फिर कीटनाशी (Insecticide) और अंत में राइजोबियम कल्चर (Rhizobium Culture) से उपचारित करना चाहिए।
उत्तर: वैज्ञानिक विधि अपनाने पर अरहर की फसल से औसतन 25 से 30 कुन्तल मुख्य अनाज (दाना) प्रति हेक्टेयर प्राप्त हो जाता है।
