कोदों की खेती (Kodo Millet Farming): कम लागत में 18 कुन्तल तक पैदावार देने वाली TOP किस्में और तरीका








सिर्फ 15 किग्रा बीज और बंपर मुनाफा! कम पानी में कोदों की खेती करने का ये सीक्रेट तरीका जान लें






सिर्फ 15 किग्रा बीज और बंपर मुनाफा! कम पानी में कोदों की खेती करने का ये सीक्रेट तरीका जान लें


मेरे प्यारे किसान भाइयों, असिंचित और सूखा प्रभावित क्षेत्रों में बोए जाने वाले मोटे अनाजों में कोदों (Kodo Millet) का एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। कोदों का पौधा अत्यधिक सहिष्णु और सूखा सहने की बेजोड़ क्षमता रखता है। उत्तर प्रदेश के उन भागों में जहाँ खरीफ के मौसम में वर्षा नियमित रूप से नहीं होती, वहाँ कोदों की फसल आसानी से उगाई जा सकती है। यह फसल 40-50 सेमी वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों के लिए बेहद उपयुक्त पाई गई है। उत्तर प्रदेश में मुख्य रूप से जनपद सोनभद्र, ललितपुर, चित्रकूट, बहराइच, खीरी व बाराबंकी में इसकी खेती की जाती है।

मधुमेह (Diabetes) के रोगियों के लिए वरदान:
कोदों के दाने कठोर बीज आवरण से ढके होते हैं, जिसे हटाकर अनाज प्राप्त किया जाता है। यह फसल अकाल की स्थिति में भी भरपूर पैदावार देती है। चिकित्सा विज्ञान में मधुमेह (Diabetes) से पीड़ित रोगियों के लिए कोदों को चावल के एक बेहतरीन विकल्प के रूप में उपभोग करने की सलाह दी जाती है। इसके भूसे की गुणवत्ता निम्न स्तर की होती है।

चावल बनाम कोदों: पौष्टिक तत्वों का तुलनात्मक संयोजन (प्रति 100 ग्राम)

पारंपरिक सफेद चावल की तुलना में कोदों में पाए जाने वाले पौष्टिक तत्व कहीं अधिक संतुलित और स्वास्थ्यवर्धक हैं:

फसलप्रोटीन (ग्राम)कार्वोहाइड्रेट (ग्राम)वसा (ग्राम)क्रूड फाइबर (ग्राम)लौह तत्व (मिग्रा.)कैल्शियम (मिग्रा.)फास्फोरस (मिग्रा.)
चावल6.878.20.50.20.610.0160.0
कोदा8.365.91.49.02.627.0188.0

1. उपयुक्त मिट्टी एवं खेत की तैयारी

  • मिट्टी: कोदों प्रायः सभी प्रकार की भूमियों में उगाया जा सकता है। यह बजरीयुक्त, पथरीली, प्रतिकूल परिस्थितियों और खराब मिट्टी के बावजूद भी कोदों की फसल से अनाज व भूसा प्राप्त होता है। लेकिन वह रेतीली बलुई मिट्टी एवं अच्छी दोमट मिट्टी में अच्छी पैदावार देती है। पानी का निकास अच्छा होना चाहिए।
  • खेत की तैयारी: वर्षा प्रारम्भ होने से पूर्व खेत की जुताई आवश्यक है, जिससे खेत में नमी की मात्रा संरक्षित हो सके। वर्षा प्रारम्भ होने से पूर्व मिट्टी पलटने वाले हल से पहली जुताई तथा दो-तीन जुताई हल/कल्टीवेटर्स से करके खेत को भली-भाँति तैयार कर लेना चाहिए।

भूमि-शोधन तकनीक (प्रति हेक्टेयर):
फसल को भूमि जनित रोगों से बचाने के लिए ट्राइकोडर्मा 2 प्रतिशत डब्लू.पी. की 2.5 किग्रा. मात्रा प्रति हेक्टेयर 60-75 किग्रा. गोबर की खाद में मिलाकर हल्के पानी का छींटा देकर 8-10 दिन तक छाया में रखने के उपरान्त आखिरी जुताई के समय खेतों में मिला दें।

दीमक, सफेद गिडार, सूत्रकृमि, जड़ की सूंडी, कटवर्म आदि कीटों से बचाव हेतु ब्यूवेरिया बेसियाना 1 प्रतिशत डब्लू.पी. बायोपेस्टिसाइड की 2.5 किग्रा मात्रा प्रति हेक्टेयर 60-75 किग्रा. गोबर की सड़ी हुई खाद में मिलाकर हल्के पानी का छींटा देकर 8-10 दिन तक छाया में रखने के उपरान्त बुवाई के पूर्व आखिरी जुताई पर भूमि में मिला देना चाहिए।

2. बुवाई का समय, विधि और बीज दर

(क) समय: कोदों की बुवाई का उपयुक्त समय 15 जून से 15 जुलाई तक है। जब भी खेत में पर्याप्त नमी हो, बुवाई कर देनी चाहिए। कोदों की बुवाई अधिकतर छिटकवाँ विधि से की जाती है, परन्तु इसकी पंक्तियों में की गयी बुवाई अधिक लाभकारी होगी।

(ख) बीज की दर: 15 किग्रा. प्रति हेक्टेयर।

3. कोदों की उन्नत प्रजातियाँ (Varieties)

कृषि विभाग द्वारा संस्तुत प्रमुख उन्नत किस्में और उनकी उत्पादकता का विवरण नीचे दिया गया है:

प्रजातिफसल की अवधि (दिवस में)उत्पादकता (कु./हे.)प्रमुख विशेषता
जे.के.-685-906-8अगेती प्रजाति
जे.के.-6280-9080-90स्थानीय जर्मप्लाज्म से चयनित
जे.के.-274-8074-80
ए.पी.के.-183-8883-88पी.एस.सी.-5 से के.एम.वी.-20
वम्बन-165-6765-67पाली प्रजाति से चयनित
जी.पी.वी.के.-365-6765-67व्यापक रूप से प्रचलित

* उपरोक्त के अतिरिक्त डिडोरी 73, पाली कोयम्बटूर-2 तथा निवास-1 अन्य उन्नत किस्में हैं।

4. खाद एवं उर्वरक का प्रयोग

जैविक खाद का प्रयोग हमेशा लाभकारी होता है, क्योंकि यह मिट्टी में आवश्यक पोषक तत्वों को प्रदान करने के साथ-साथ पानी संरक्षण क्षमता को भी बढ़ाता है। 5 से 10 टन प्रति हेक्टेयर की दर से कम्पोस्ट खाद पहली जुताई के समय मिलाना लाभकारी होता है।

खेत में 40:20:20 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से नत्रजन, फास्फोरस तथा पोटाश का प्रयोग करना चाहिए। नत्रजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा खेत में बुवाई के समय कूंड़ों में बीज के नीचे डाल देना चाहिए। नत्रजन का शेष आधा भाग बुवाई के लगभग 30-35 दिन बाद खड़ी फसल में प्रयोग करना चाहिए।

5. जल प्रबन्धन एवं खरपतवार नियंत्रण

जल प्रबन्धन: कोदों की खेती प्रायः खरीफ में की जाती है, जहाँ पानी की आवश्यकता नहीं पड़ती। फिर भी यदि पानी की सुविधा उपलब्ध हो तो एक या दो सिंचाई की जा सकती है। अत्यधिक वर्षा की स्थिति में पानी की निकासी का प्रबन्ध अति आवश्यक है।

खरपतवार नियंत्रण: पौधे की बढ़वार के शुरुआती स्थिति में खेत खरपतवार रहित होना चाहिए, मुख्यतः बुवाई के बाद आवश्यकतानुसार निराई-गुड़ाई 15 दिन के अन्तराल पर करना चाहिए। निराई-गुड़ाई हैण्ड-हो अथवा हवील-हो से की जा सकती है।

6. फसल सुरक्षा: रोग एवं कीट नियंत्रण

प्रमुख रोग और रोकथाम:

  1. अरगट: यह बीजजनित रोग है और फफूँद के कारण होता है। इस रोग का प्रकोप पौधों में फूल आने के समय होता है। इसमें फूलों से एक चिपचिपा, हल्के रंग का स्राव निकलता है, जो बाद में सूखकर एक पपड़ी बना देता है। रोगग्रसित अनाज का उपयोग मनुष्य एवं जानवर दोनों के लिए हानिकारक होता है।

    रोकथाम: यदि बीज प्रमाणित नहीं है तो बोने से पहले 20 प्रतिशत नमक के घोल में बीज डुबोकर तुरन्त बीज (स्केलेरेशिया) को अलग कर देना चाहिए तथा शुद्ध पानी से 4-5 बार धोकर बीज का प्रयोग किया जाय। खेत में गर्मी की जुताई अवश्य करनी चाहिए। फसल में फूल आने से पूर्व निम्न कृषि रक्षा रसायनों में से किसी एक का छिड़काव 15 दिन के अन्तर पर करना चाहिए – (क) जिरम 80 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण 2.0 किग्रा. प्रति हे., (ख) मैनकोजेब घुलनशील चूर्ण 2.0 किग्रा. प्रति हे., (ग) जिनेब 75 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण 2.0 किग्रा. प्रति हे.।
  2. कण्डुवा: इस रोग में बाली में काले चूर्ण जैसे कवक के बीजाणु भर जाते हैं। आरम्भ में बीजाणु एक हल्की पीली रंग की झिल्ली से ढके रहते हैं, जो आगे चलकर फट जाती है तथा बीजाणु बाहर निकलकर फैल जाते हैं।

    रोकथाम: बुवाई से पूर्व बीजोपचार के उपरान्त ही बीज का प्रयोग बोने के लिए किया जाना चाहिए। बीजोपचार थीरम 75 प्रतिशत डी.सी. अथवा कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत डब्लू.पी. 2.5 ग्राम प्रति किग्रा. बीज की दर से करना चाहिए।
  3. रतुआ / गेरूई: यह फफूँदी जनित रोग है। प्रभावित पत्तियों पर भूरे रंग के फफोले दिखाई पड़ते हैं। फलतः प्रकाश संश्लेषण को प्रभावित करता है, जिससे पैदावार प्रभावित होती है।

    रोकथाम: रोग के रोकथाम हेतु मैनकोजेब 75 डब्लू.पी. अथवा जिनेब 75 प्रतिशत डब्लू.पी. का 2 किग्रा. प्रति हे. की दर से खड़ी फसल पर छिड़काव करना चाहिए।
कीट एवं रोकथाम:
साधारणतया दीमक, तनाबेधक कीट कोदों को नुकसान पहुँचाते हैं।

  • रोकथाम (तनाबेधक): तनाबेधक की रोकथाम हेतु कार्बोफ्यूरॉन 3 प्रतिशत जी.आर. 20 किग्रा./हे. की दर से करना चाहिए।
  • रोकथाम (दीमक): दीमक की रोकथाम हेतु ब्यूवेरिया बेसियाना 1.15 प्रतिशत की 2.5 किग्रा. प्रति हे. 60-75 किग्रा. गोबर की खाद में मिलाकर हल्के पानी का छींटा देकर 8-10 दिन तक छाया में रखने के उपरान्त बुवाई के पूर्व आखिरी जुताई पर भूमि में मिला देने से दीमक सहित अन्य भूमिजनित कीटों की रोकथाम हो जाती है। खड़ी फसल में दीमक कीट का प्रकोप देखे जाने पर क्लोरपायरीफास 20 प्रतिशत ई.सी. की 2.5 ली. प्रति हे. की दर से सिंचाई के पानी के साथ प्रयोग करना चाहिए।

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7. कटाई, मड़ाई एवं भंडारण

कटाई व मड़ाई: फसल कटाई के लिए माह सितंबर व अक्टूबर में पक कर तैयार हो जाती है। फसल की कटाई जमीन से सटाकर करते हुए बण्डल बनाकर एक सप्ताह सूखने के लिए छोड़ देते हैं, फिर मड़ाई कर अनाज अलग कर लेते हैं।

उत्पादन: औसत उत्पादन 15-18 कुन्तल प्रति हेक्टेयर। चारा: 30-40 कुन्तल प्रति हेक्टेयर। उचित भण्डारण के लिए नमी की मात्रा 10 से 12 प्रतिशत होनी चाहिए।

भण्डारण: कटाई तथा मड़ाई के बाद बीज को धूप में भली-भाँति सुखा लेना चाहिए। बीजों को नमी रहित स्थानों पर भण्डारित करना चाहिए।

📞 कृपया अधिक जानकारी हेतु किसान कॉल सेन्टर के निःशुल्क टोल फ्री नं. 1800-180-1551 पर सम्पर्क करें।
विशेष जानकारी हेतु कृषि विभाग के स्थानीय अधिकारी/कर्मचारी से सम्पर्क करें अथवा कृषि विभाग की वेबसाइट : www.upagripardarshi.gov.in देखें।

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❓ कोदों की खेती से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1. कोदों की बुवाई का सबसे सही समय क्या है?

उत्तर: कोदों की बुवाई का सबसे उपयुक्त समय 15 जून से 15 July तक होता है, जब खेत में पर्याप्त नमी मौजूद हो।

Q2. प्रति हेक्टेयर कोदों की खेती में कितने बीज की जरूरत होती है?

उत्तर: वैज्ञानिक विधि से उन्नत खेती करने के लिए प्रति हेक्टेयर 15 किलोग्राम साफ और उपचारित बीज की आवश्यकता होती है।

Q3. कोदों की फसल से कुल कितना उत्पादन मिल जाता है?

उत्तर: कोदों की फसल से औसतन 15 से 18 कुन्तल प्रति हेक्टेयर मुख्य अनाज और लगभग 30 से 40 कुन्तल सूखा चारा (भूसा) प्राप्त होता है।

Q4. कोदों को शुगर (Diabetes) के मरीजों के लिए क्यों बेहतर माना जाता है?

उत्तर: कोदों में सामान्य सफेद चावल के मुकाबले 45 गुना ज्यादा क्रूड फाइबर (9.0 ग्राम) और भरपूर मात्रा में आयरन व कैल्शियम पाया जाता है, जो ब्लड शुगर को कंट्रोल रखने में मदद करता है।




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